हिंदुओं के सबसे बड़े त्योहार दीवाली को लेकर यह तो सभी को जानते हैं कि कार्तिक मास की अमावस्या तिथि को माता लक्ष्मी का जन्म हुआ था। इसलिए दिवाली के दिन भगवान गणेश और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। श्रीराम ने लंका विजय करने के बाद इसी दिन अयोध्या लौटे थे जिसकी खुशी में लोगों ने घी के दीये जलाए थे। लेकिन यह बात कम लोगों को ज्ञात है कि दीपावली के दिन सूर्य और चंद्रमा दोनों तुला राशि में होते हैं। तुला का स्वामी शुक्र है। शुक्र धन-धान्य प्रदान करने वाला ग्रह है। इसलिए दीवाली पर धन-धान्य और वैभव में वृद्धि होती है।
पांच राजयोग में गजकेसरी, हर्ष, उभयचरी, काहल और दुधरा के योग बन रहे हैं। वहीं तीन शुभ योग महालक्ष्मी योग, आयुष्मान योग और सौभाग्य योग बन रहे हैं। गजकेसरी योग में सम्मान और लाभ की प्राप्ति होगी। हर्ष से धन लाभ मिलेगा। सम्पत्ति और प्रतिष्ठा बढेगी। सोमवार छह नवम्बर से शुभ योग की शुरुआत हो चुकी है जोकि दीवाली तक तक चलेगी। दीवाली के बाद सोमवार से आंशिक सोमवती अमावस्या शुरु होगी। कार्तिक मास की अमावस्या को कालरात्रि के नाम से भी संबोधित किया जाता है। हालांकि दीवाली वाली रात पूर्ण कालरात्रि नहीं होती है।
पूरी रात्रि को दो भागों में विभक्त किया जाता है। रात्रि का पहला भाग अर्थात अर्धरात्रि तक लक्ष्मी, गणेश, पंचदेवों की उपासना की जाएगी इसलिए सिद्ध रात्रि या़ श्री रात्रि कही जाती है। दीवाली की अर्धरात्रि के बाद से लेकर सूर्योदय से दो घडी पूर्व तक यानि रात 12 बजे से प्रातः 5 बजे तक महानिशा काल कहा जाता है। जो साधक महानिशा में साधना करना चाहे उन्हें रात्रि 11 बजे तक सभी तैयारियां पूरी कर लेनी चाहिएं। महानिशा काल में श्रीलक्ष्मी जी की आराधना करने से अक्षय धन-धान्य की प्राप्ति होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन मां लक्ष्मी की पूजा करने से सुख-समृद्धि, धन, यश और वैभव सभी की प्राप्ति होती है।
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प्रातःकाल - प्रातः 8ः02 मिनट से दोपहर 12ः11 मिनट तक।
अवधि: 4 घंटे नौ मिनट
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अपराह्न: दोपहर 1ः 34 मिनट से दोपहर 2ः 57 मिनट तक।
अवधि: एक घंटा 23 मिनट
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सायंकाल: शाम 5ः42 मिनट से रात 10ः34 मिनट तक।
अवधि: चार घंटे 52 मिनट